मां दुर्गा की आराधना के महापर्व नवरात्रि में कलश स्थापना का महत्व….

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झांसी। मां दुर्गा की आराधना का महापर्व यानी नवरात्र या यूं कहें नवरात्र मतलब शक्ति पूजा के पवित्र 9 दिवस। नवरात्रि पर्व के दौरान हर और माता की भक्ति का माहौल होता है और यही वो 9 दिन होते हैं जब लोग माता की पूजा अर्चना करके अपने जीवन की कठिनाईयों को दूर करने की उनसे विनती करके अपने जीवन को सुखमय बनाते हैं। इन दिनों जगह-जगह मां दुर्गा की प्रतिमाओं की स्थापना करके 9 दिनों तक पूरे विधि विधान से उनका पूजन अर्चन किया जाता है और विभिन्न धार्मिक आयोजन सम्पन्न होते है।
इस वर्ष शारदीय नवरात्रि 29 सितंबर से शुरू हो गयीं है और 8 अक्टूबर को दशहरा मनाया जाएगा। इस दौरान नौ दिनों तक मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा अर्चना की जाएगी। नवरात्र में व्रत और शक्ति आराधना की शुरुआत से पहले कलश स्थापना की जाती है। कलश स्थापना में कुछ खास बातों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक होता है। कलश स्थापना का अर्थ है नवरात्रि के समय ब्रह्मांड में उपस्थित शक्तितत्त्व का घट अर्थात कलश में आह्वान कर उसे सक्रिय करना। शक्तितत्व के कारण वास्तु में उपस्थित कष्टदायक तरंगें नष्ट हो जाती हैं। नवरात्र के पहले दिन पूजा की शुरुआत दुर्गा पूजा निमित्त संकल्प लेकर ईशानकोण में कलश स्थापना करनी चाहिए।
इस प्रकार का हो कलश
कलश सोना, चांदी, पीतल, तांबा या मिट्टी का होना चाहिए। देखने में सुडौल और पवित्र होना चाहिए। मिट्टी के ऐसे कलश का प्रयोग नहीं करना चाहिए, जिसमें छेद होने की संभावना हो। विशेष मनोकामना पूर्ति के लिए पूजा करनी हो तो धातु के कलश की ही स्थापना करनी चाहिए। कलश में गंगा जल, तीर्थ, नदी, तालाब, झील या किसी पवित्र कुंड का जल कलश डाल सकते हैं। कलश के नीचे सप्त.मृत्तिका यानी सात तरह की मिट्टी रखने का विधान है। ( घुड़साल यानी अस्तबल की मिट्टी, हाथी बांधने की जगह, गोशाला की मिट्टी, वल्मीक यानी दीमक की बांबी की मिट्टी, नदी संगम की मिट्टी, तराई और राज.द्वार की मिट्टी) रखनी चाहिए। कलश में सर्वौषधि (यमुरा, जटामासी, वच, कूट, हल्दी, दारु-हल्दी, कचूर, चम्पा तथा नागर मोथा) रखनी चाहिए। इसके साथ ही, पञ्च.पल्लव यानी आम, पलाश, बरगद, पीपल तथा चकिल के पत्ते और पूजा की सुपारी भी श्रद्धापूर्वक रखनी चाहिए।
यदि कोई सामग्री उपलब्ध न हो, तो उसके स्थान पर अक्षत चढ़ाने का विधान है। कलश के नीचे शुद्ध मिट्टी में जौ बोना चाहिए। जौ को आदि अन्न माना जाता है। जौ के पौधे को जयन्ती कहते हैं। जयन्ती से अनुष्ठान की सफलता का निर्धारण होता है। इन 9 दिनों में जौ को पानी से सींचना चाहिए।
खुला ना रखें कलश
कलश स्थापना करने से पहले ये ध्यान रखें कि जिस स्थान पर कलश स्थापित किया जाएगा, वो जगह साफ होनी चाहिए। कलश स्थापना के लिए एक लकड़ी का पाटा लें और उस पर नया व साफ लाल कपड़ा बिछाएं। ध्यान देने वाली बात है कि कलश का मुंह खुला न छोड़ें, उसे ढक दें। वहीं अगर कलश को किसी ढक्कन से ढका है तो उसे चावलों से भर दें और उसके बीचों-बीच एक नारियल भी रखें।
घट स्थापना के मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य के अनुसार चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में घट स्थापना नहीं करनी चाहिए। इस साल ये नक्षत्र योग नहीं होने से कलश स्थापना के लिए 4 शुभ मुहूर्त हैं। कलश स्थापना शुभ लग्न, अभिजित मुहूर्त या शुभ चैघड़िया मुहूर्त में करनी चाहिए।
सुबह 7ः45 से 09ः15 तक
सुबह 09ः15 से 10ः43 तक
सुबह 11ः02 से दोपहर 12ः05 तक
दोपहर 01ः45 से 03ः05 तक
कलश स्थापना की विधि
उत्तरदृपूर्व दिशा देवताओं की दिशा है। इसलिए, इस दिशा में माता की प्रतिमा और घट स्थापना करें।
कलश स्थापित करने से पहले सभी जरूरी चीजें पास रख लें। फिर मां दुर्गा का ध्यान मंत्र बोलकर प्रणाम करें।
इसके बाद साफ बाजोट के नीचे गौमूत्र और बाजोट पर गंगाजल छिड़कें।
फिर सभी जरूरी चीजें बाजोट पर रखकर कर कलश स्थापना करें।
घटस्थापना के समय बोले जाने वाले मंत्र मालूम न हों, तो सभी वस्तुओं के नाम लेते हुए समर्पयामि का उच्चारण करें। शास्त्रीय विधि से कलश में डाले जाने वाले सभी पदार्थ न मिलने पर चंदन, रोली, हल्दी की गांठ, सुपारी, एक रुपए का सिक्का, गंगाजल व दूर्वादल ही कलश में डाल सकते हैं।
पूजा के समय दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और अखंड दीपक जलाएं जो 9 दिन तक जलता रहे। स्थापना और पूजा करने के बाद माता को फल, मिठाई व दूध का भोग लगाएं। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करवाएं और प्रसाद बांट दें।
कलश स्थापना का मंत्र
कलशस्य मुखे विष्णुरू कण्ठे रुद्ररू समाश्रितरू।
मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणारू स्मृतारू।।
अर्थात् कलश के मुख में विष्णुजी,कण्ठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा और कलश के मध्य में सभी मातृशक्तियां निवास करती हैं।
मां दुर्गा का ध्यान मंत्र
विद्युद्‌दाम समप्रभां मृगपति स्कन्धस्थितां भीषणां
कन्याभिः करवाल खेट विलसद्धस्ताभिरा सेविताम्‌
हस्तैश्चक्रगदासि खेट विशिखांशचापं गुणं तर्जनीं
विभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे ।।
कलश स्थापना से लाभ
1. कलश को भगवान गणेश का प्रतिरूप भी माना जाता है, इसलिए हमारे कामों में आ रही रुकावटों को दूर करता है।
2. घर में शांति और सुख लाता है। नारियल को शुभ फल देने वाला माना जाता है।
3. घर के मंदिर में रखा गया कलश वहां का माहौल भक्तिमय बनाता है। आपको पूजा में एकाग्रता देता है।
4. घर में बीमारियां हों तो नारियल का कलश उसको दूर करने में मदद करता है।
5. अपने आसपास की नकारात्मक ऊर्जा को खत्म कर देता है।

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